बिन सजनी घर
मौली थोड़े दिनों के लिए मायके क्या गई, समीर फूले गुब्बारे की तरह उड़ने लगा लेकिन पीछे से जब घर संभालने की बारी आई तो गुब्बारे की हवा फुस हो कर रह गई. टिंगटोंग, टिनटोंग. . .लगातार बजती दरवाजे की घंटी से समीर हड़बड़ा कर उठ बैठा, रात पत्नी मौली को मुंबई के लिए रवाना कर एयरपोर्ट से लौटा तो घोड़े बेच कर सोया था. आज दूसरा शनिवार था, ऑफिस की छुटटी जो थी, देर तक सोने का प्लान किस कमबख्त ने भंग केर दिया . वह अनमनाया सा स्लीपर के लिए नीचे झुका, तो रात में उतार फेंके बेतरतीब पड़े जुटमोजे ही नजर आये. घंटी बजे जा रही थी. साथ ही मेड की आवाज- "अब जा रही हूं मैं, साहब, 2 पहले भी लौट चुकी हूं." समीर ने घड़ी देखी, उफ, 10 बज गए, मर गया, " अरे रुको, रुको, आता हूं" वह नंगे पांव ही भागा. मोजे के नीचे बोतल का ढक्कन, जो कल पानी पी कर बेफिक्री से फेंक दिया था, पांव के नीचे आया और वह घिसटता हुआ सीधा दरवाजे से जा टकराया. माथा सहलाते हुए दरवाजा खोला, तो मेड ने गमले के पास पड़ी दूध की थैली और अखबार उसे थमा दिए. " क्या साहब, चोट लगी क्या? " खिसिआय...