ग्रीन सिगनल





खामोश थी निगाहें उन की मैं समझ ना सका। 

ये प्यार है या फरेब निगाहों से तीर मारे थे हजारों दिल में इस तरह चुभ कर रह गए सभी के सभी निकाल ना सका कोई उन को। 

प्यार की घंटी बज चुकी थी जब हम चौराहे पर मिले थे ग्रीन सिगनल मिलते ही साथ साथ चल पड़े थे समाज ने रेड सिगनल दे कर दो दिलों की धड़कनों को रोक दिया था।

मुद्दतो के बाद ऐसे मिले जैसे हम अनजान थे। उसके दिल में राज किया था मैंने क्यों ना मैं दो कदम आगे बढ़कर उस को रोकूं क्यों ना मैं बहते हुए आंसुओं को पोंछू जोरजबरदस्ती का अंजाम देखा हम ने चुपके से समाज से दूर होकर एक आशियाना बनाया जहां सुकून मिल सके। 

लेकिन वह भी ज्यादा दिन ठहर ना सका आंधीतूफान में सब खाक हो गया उन सुर्खियों की ढेर में फिर भी भावनाएं ढूंढती रहती हैं उस ग्रीन सिगनल को। 

 

 



 



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ज़रूरतमंद लोगों तक यथासंभव तथा यथाशीघ्र सहायता पहुंचाई रिमोना सेनगुप्ता ने

'कमिश्नरी' बनने के बाद क्राइम में कमी नहीं आई:तरुण भारद्वाज

बुजुर्गों का सम्मान!

कर्मचारियों एवं मजदूरों को अपना जीवन यापन में समस्या का सामना न करना पड़े: DM

नोएडा: अनुमति के बाद भी शुरू नहीं हो पाएंगी फ़ैक्टरिया

Oil & Gas: Pre Budget Reflections

पिता पुत्र का अनोखा रिश्ता