सर्वोत्तम सौंदर्य

एक गृहस्थ को सर्वोत्तम सौंदर्य की खोज थी, सो वे एक तपस्वी के पास पहुंचे और उनके सम्मुख अपनी जिज्ञासा प्रकट की उन्होंने उत्तर दिया श्रद्धा। श्रद्धा मिट्टी के ढेले को गणेश बना सकती हैं। तपस्वी से समाधान ना हो पाते देख एक भक्तजन के पास पहुंचे और अपना मंतव्य बताया। उन्होंने कहा प्रेम ही सुंदर है, काले कृष्ण गोपियों को प्राण प्रिय लगते थे। इससे समाधान कुछ हुआ, कुछ नहीं हुआ। सोच विचार करते हुए आगे चल पड़े, तो उन्होंने युद्ध भूमि से लौटा शस्त्रों से लदा एक सैनिक मिल गया। तो उससे भी पूछा सौंदर्य कहां हो सकता है, सैनिक का उत्तर था, शांति में। इस तरह जितने मुंह उतनी बातें निराश अपने घर लौटे। 2 दिन की प्रतीक्षा में सभी घरवाले व्याकुल हो रहे थे पहुंचे तो सभी लिपट गए। पुत्री की से आंसू गिर पड़े आत्मीयता का, स्नेह का, गहन श्रद्धा का, सागर सा उमड़ पड़ा। सभी को असाधार शांति का अनुभव हुआ। गृहस्थ ने तीनों समाधान का समन्वय अपने घर ही देखा। उसके मुंह से निकल पड़ा कहां भटक रहा था श्रद्धा, प्रेम और शांति इन तीनों के दर्शन तो अपने ही घर में हो रहे हैं।  यही सबसे श्रेष्ठ एवं सर्वाधिक सौंदर्य पूर्ण कृति है। 


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