हजरत अबू बकर
हजरत अबू बकर का विश्वास था कि निर्धन से निर्धन नागरिक को जीवन यापन के लिए जितनी सुविधाएं उपलब्ध हैं, उससे अधिक सुविधाएं लेने का अधिकार राज्य के किसी कर्मचारी को नहीं होना चाहिए। इसलिए राज्य के कोषालय से अपने खर्च के लिए वे केवल 2 दिरहम लेते हैं।
हजरत की इस जानबूझकर निर्धनता से उनकी पत्नी तंग आ गई थी। उसे बिल्कुल पसंद ना था कि जिस व्यक्ति का पूरे राज्य में सम्मान हो उसकी पत्नी गरीबी और परेशानी से जीवन यापन करें। 1 दिन परेशान होकर उसने हजरत अबू बकर से कहा यह भी कोई व्यवस्था है कि जब देखो तब सूखी रोटियां। ऐसा प्रयत्न कीजिए कि किसी दिन कुछ मिठाइयों की भी व्यवस्था हो सके ताकि भोजन कुछ तो अच्छा लगे।
हजरत अबू बकर ने उत्तर दिया खाना बनाने का काम तुम्हारे जिममें है, रोज-रोज थोड़ा बता कर मिठाई की व्यवस्था की जा सकती है। उनकी पत्नी ने सुझाव पर विचार किया और अपने दैनिक भोजन में से कुछ बचत आरंभ कर दी अबू बकर ने मिठाई के विषय में पूछा तो पत्नी ने गर्भ पूर्वक बचत की बात बताइ। सुनकर अबू बकर प्रसन्न हुए उन्होंने सोचा कि यह दिन परमपिता परमात्मा की दैनं है। ऐसा सोचते हुए भी बोले जनता रुखा सुखा खाकर जिस जिस प्रकार अपना पेट पालती है। तब फिर सोचो कि हमें मिष्ठान जैसे स्वादिष्ट भोजन का अधिकार कहां है हमें। 2 दिरहम की जगह 1:30 दिरहम में ही काम चला लेना चाहिए। ऐसा कहकर उन्होंने गुजारे के लिए 1:30 दिरहम लेने शुरू कर दिए। उनके इस व्यवहार ने पत्नी को भी नतमस्तक कर दिया।
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