बुजुर्गों का सम्मान!


बुजुर्गों का सम्मान हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है, लेकिन बदलते समय के साथ इसमें गिरावट आ चली है। विश्व स्तर पर वृद्धों की स्थिति का आकलन करने वाले आंकड़ों के आधार पर भारत में वृद्धों की स्थिति संतोषजनक नहीं है।


परिवार एवं समाज में उनकी अपेक्षा एवं तिरस्कार की घटनाएं बढ़ती जा रही है। बढ़ते वृद्धाश्रम की संख्या इस कटु सत्य की ओर संकेत करती है। इसमें सुधार की अत्यंत आवश्यकता है।


हमें नहीं भूलना चाहिए कि बुजुर्ग अनुभव से पक्की श्रद्धा सम्मान के पात्र परिवार के बहुमूल्य सदस्य एवं किसी भी समाज के लिए अमूल्य होते हैं। इनकी देखरेख हमारा पावन कर्तव्य है और संयुक्त परिवार विखंडित हो रहे हैं। परिवार का ताना-बाना भी बिखर रहा है।



एकल परिवारों का चलन जोरों पर है। बच्चों का विकास अवरुद्ध सा दिखता है। ऐसे में परिवार में बुजुर्गों के महत्व को समझने की जरूरत है। बुढ़ापे में इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं शरीर पूरी क्षमता के साथ काम करने में सक्षम नहीं होता है। यह हर इंसान के लिए सत्य है कि सबको एक दिन बुढ़ापे की इस अवस्था से गुजर ना ही होता है। अतः हमारा कर्तव्य बनता है कि अवश्य  प्रक्रिया का सम्मान करें और बुजुर्गों को इसका सामना करने में आवश्यक सहयोग देने की पूरी व्यवस्था करें। साथ ही हर युवा  को भी समय रहते वृद्धावस्था के लिए पूर्व से दूरदर्शिता भरी तैयार करने की आवश्यकता है, जिससे कि वे समय आने पर अपनी गरिमामई उपस्थिति के साथ परिवार समाज में महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।


दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका में वे इस आधार पर अपना विलक्षण योगदान दे सकते हैं। आज की भागमभाग वाली जिंदगी में नौकरी पेशा माता पिता के पास बच्चों के लिए अधिक समय नहीं होता। ऐसे में बच्चों के विकास के लिए घर में बैठे बुजुर्ग की गोद एक भूमिका होती है जिसमें बचपन बखूबी पनप सकता है। बुजुर्ग अनुभवों से परिपक्व चलते-फिरते पुस्तकालय होते हैं। बुजुर्गों के जीवन भर के अनुभवों से पक्की कहानियां रोचक संस्मरण ज्ञानवर्धक बातें एक अमूल्य है।  जिनकी छाया में एक शानदार एवं यादगार बचपन पनप सकता है। ऐसा बचपन सौभाग्यशाली है, जिसे बुजुर्गों का समर्थ संबल मिलता है। ऐसे व्यक्ति निश्चित रूप से जीवन प्रति गहरी भावनात्मक संतुष्टि एवं दृढ़ता लिए होंगे और जीवन की चुनौतियों का बखूबी सामना करने की स्थिति में भी होंगे।


ऐसे में बुजुर्गों का कर्तव्य बनता है कि वे जीवन के अनुभवों से नई पीढ़ी को यथासंभव लाभ दें। बच्चों के साथ बिताने के लिए गुणवत्तापूर्ण समय निकालें। बच्चों की शिक्षा से लेकर उनको संस्कार संपन्न बनाने में अपना आवश्यक योगदान दें। ऐसा करने में उन्हें गहरी संतुष्टि बाद शांति मिलेगी और साथ ही जीवन की आपाधापी में खोए व्यस्त माता-पिता के लिए भी एक बड़ा संभल साबित होंगे। परिवार व समाज के लिए उपयोगिता के आधार पर जो सम्मान एवं गौरव का भाग मिलता है। उसके वे सहज रूप से अधिकारी बनेंगे आज यह वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध तथ्य है कि 8 वर्ष की आयु तक बच्चों का 80% बौद्धिक विकास हो जाता है। अतः जीवन के इन प्रारंभिक वर्षों में बुजुर्ग बच्चों की भावी जीवन की सशक्त नीम रखने में अपना उल्लेखनीय योगदान दे सकते हैं। घर में पढ़ाई लिखाई के साथ बच्चों के साथ बुजुर्ग बाहर घूमने का समय निकाल सकते हैं और उनकी बाल सुलभ जिज्ञासाओं का समुचित समाधान करते हुए उनके ज्ञान में वृद्धि कर सकते हैं।


इस तरह परिवार में बुजुर्ग अपनी मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हुए जीवन की ढलती शाम को संतोष पूर्ण ढंग से बिता सकते हैं और नई पीढ़ी के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण दे सकते हैं ही समय के थपेड़ों के बीच टूटते बिखरते परिवारों को प्रेम से जोड़े रखने का कार्य भी वे सहज ही संपन्न कर सकते हैं। 


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