बेपरवाह

 दिखे हम बेपरवाह सजाए पलकों पर आंसु रुके हुए थके हुए वीरान कोने में बैठे हैं।


पास बहुत कुछ है बयां करने को आज बस अल्फाज नहीं है।


हुई क्या नाराज जिंदगी जो ख्वाब बनकर रह गई,


मंजिले अपनी किया था वादा वक्त से साथ चलने का,


मगर वही वक्त आज छोड़ चला है।


शीशा कर लेता है प्रेम पत्थर से,


बहुत पर उसी पत्थर से चोट भी खाता है,


उस पाषाण को फर्क पड़ता नहीं मगर शीशा तो टूट जाता है।


शीशे जैसे ही हैं अरमान ढूंढते हैं दोस्तों को पर हर कोई पत्थर लिए नजर आता है, 


दिखे हम बेपरवाह कितनी भी मगर पाषाण सा कठोर भी नीर से टूट जाता है।


तूफान चाहे ताउम्र हो या घड़ी भर का घरौंदा तो आखिर बिखर ही जाता है 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ज़रूरतमंद लोगों तक यथासंभव तथा यथाशीघ्र सहायता पहुंचाई रिमोना सेनगुप्ता ने

'कमिश्नरी' बनने के बाद क्राइम में कमी नहीं आई:तरुण भारद्वाज

बुजुर्गों का सम्मान!

कर्मचारियों एवं मजदूरों को अपना जीवन यापन में समस्या का सामना न करना पड़े: DM

नोएडा: अनुमति के बाद भी शुरू नहीं हो पाएंगी फ़ैक्टरिया

Oil & Gas: Pre Budget Reflections

पिता पुत्र का अनोखा रिश्ता