रक्षाबंधन पर विशेष: रक्षाबंधन का असली मतलब तो लोग भूलते जा रहे हैं

भारत की सनातन परंपरा पर्व प्रधान है। ये पर्व सृष्टि के क्रमिक विकास के वार्षिक पड़ाव हैं। प्रति वर्ष आकर ये जीवन के विकासक्रम को संस्कारित करते हैं और आगे अपने धर्म के निर्वहन की प्रेरणा भी देते हैं


व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।


दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥


यजुर्वेद (19.30) में कहा गया है-व्रत से दीक्षा मिलती है, दीक्षा के समय दक्षिणा दी जाती है। दक्षिणा से श्रद्धा बढ़ती है, श्रद्धा से सत्य रूप परमेश्वर की प्राप्ति होती है। व्रत वह शक्ति है, जिसके द्वारा मनुष्य की सोई हुई शक्तियां जागृत होती हैं। असंभव कार्यों को संभव होते देखकर उसकी निष्ठा बढ़ती है। ज्यों-ज्यों उसकी निष्ठा की वृद्धि होती जाती है, त्यों-त्यों वह त्याग की भूमिका में पदार्पण करता है।


त्याग द्वारा शक्तियों का विकास होकर उसकी श्रद्धा में वृद्धि होती है। श्रद्धा की दृढ़ता से सत्य का मार्ग खुल जाता है। इसलिये हमारे धर्म में व्रतों, त्योहार और पर्वों को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। श्रावणी वेद का त्योहार है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि इस दिन से वेद पारायण आरम्भ करते थे, जिसको ‘उपाकर्म’ कहा जाता था। वैसे तो वेद का पाठ करना द्विज मात्र का नित्य का कर्त्तव्य है, परन्तु वर्षा ऋतु में उसके लिये विशेष रूप से प्रबन्ध किया जाता था। इन धार्मिक आयोजनों को आरंभ करने का समय श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को चुना गया। यही परंपरा आज भी चली आ रही है। उस समय लोग वेद पाठ के संकल्प किया करते थे, वेद मंत्रों को कंठाग्र करने की प्रतिज्ञा लेते थे। इन प्रतिज्ञाओं, संकल्पों और पारायण करने के आधार पर ही द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी नाम पड़ा ।


आज दुर्भाग्यवश हम इस परंपरा को लोग भूलते जा रहे हैं, इसलिए वेद जैसे बृहद ज्ञान के भंडार से हम वंचित हो रहे हैं। वेद प्रचार का संकल्प इसी अवसर पर लिया जाता है।


रक्षाबंधन का त्योहार भी इसी दिन मनाया जाता है। यह रक्षासूत्र है। इनको ब्राह्मण वेद मन्त्रों से अभिमंत्रित करते थे। तप और त्याग की शक्ति का मिलन वेद मंत्रों की शक्ति के साथ होने से सोने पर सुहागे का काम करता है। उस समय ब्राह्मण राष्ट्र के नेता होते थे, जनता को सन्मार्ग पर लगाना उनका कर्त्तव्य था। आसुरी विचारों से रक्षा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी।


इस दिन वह भी अपने पुराने संकल्प को स्मरण करते हैं कि द्विजातियों को ऊंचा उठाने के लिये उन्हें क्या करना है? यदि एक वर्ष में उनके कार्य में कोई शिथिलता आ गई हो तो पुनः जागरुकता आ जाती थी, परन्तु खेद का विषय है कि आज कल हमने इस पवित्र त्योहार को केवल अपने धनोपार्जन का साधन बना दिया है और अपने यजमान को सूत्र बांधकर एक-दो उल्टे-सीधे मंत्र पढ़कर पैसा ऐंठने का प्रयत्न करते हैं।


जिस देश के पथ-प्रदर्शक अपने कर्त्तव्य को भूल जाते हैं, उनका पतन की ओर जाना अवश्यम्भावी है, चूंकि ब्राह्मणों का काम धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और उनका उपदेश करना होता था और वह स्वतंत्र रूप से जीवन निर्वाह के लिए कोई कारोबार  नहीं करते थे, इसलिए शिष्यगण उनकी आवश्यकता की पूर्ति के लिए धन, वस्त्र आदि के रूप में दक्षिणा दिया करते थे, जो आज तक प्रचलित है। व्रत धारण करते समय शिष्य गुरु को अपनी  श्रद्धा के अनुसार भेंट करते थे। आज दोनों ओर से शिथिलता आ गई है। इस शिथिलता का दृढ़ता में परिवर्तन करने के लिये ही यह त्योहार मनाया जाता है।


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