पाताल का राजा

एक बार महाराज कृष्णदेव राय ने तेनालीराम से किसी विचित्र जगह पर घूमने की इच्छा प्रकट की| तेनालीराम बोले:-” महाराज! मैं आपको ऐसी जगह पर घुमा कर लाऊंगा, जहां आप आज तक कभी नहीं गए होंगे| आपने उस जगह के बारे में किसी से सुना भी नहीं होगा|”


कृष्णदेवराय, तेनालीराम की बातें सुनकर हैरान रह गए और उनकी उत्सुकता और बढ़ गई| उन्होंने तेनालीराम से ऐसी जगह तुरंत ही चलने का आग्रह किया| एक दिन शुभ मुहूर्त में राजा कृष्णदेव राय अपनी सेना सहित तेनालीराम के साथ चल दिए|


तेनालीराम इन सभी को लेकर जंगल के बीच में एक गुफा में प्रवेश कर गए| कृष्णदेव राय ने तेनालीराम से कहा:-” इस जंगल में से होकर गुजरे हैं, यहां पर हम अनेकों बार शिकार खेलने आए हैं|”


तेनालीराम ने उत्तर दिया:-” महाराज! आप इस जंगल में से हजारों बार निकले होंगे, परंतु इस राज्य में आप पहली बार ही आए हैं|”
कृष्णदेव राय ने हैरानी भरी नजरों से तेनालीराम को देखते हुए कहा:-” हमारे राज्य में यह दूसरा राज्य कहां से आ गया है?”


तेनालीराम ने कहा:- “महाराज! अभी पता चल जाएगा|” इतना कहकर तेनालीराम सब को थोड़ा आगे ले गए और एक जगह पर उन्होंने गुफा की दीवार को ठकठकाया| इससे दीवार एक और सरक गई| वहां से कितने ही सैनिक निकले जिन्होंने एक साधु को पकड़ रखा था| कृष्णदेवराय उस साधु को पहचान कर बोले:-” अरे! यह तो चमत्कारी बाबा है|”


तेनालीराम ने कहा:-” नहीं महाराज! यह तो इस पाताल नगरी के राजा हैं| यहां पर इन्होंने पाताल नगरी वसा रखी है| इनके पास कई हजार सैनिक हैं और बहुत बड़े खजाने के मालिक हैं|”


इतना कहकर तेनालीराम पाताल नरेश का खजाना, महाराज कृष्णदेव राय को दिखाने लगे| अब तेनालीराम, महाराज को सुरंग के एक बहुत बड़े कमरे में ले गए|


यहां पर बहुत सारे सैनिकों ने अन्य सैनिकों को कैद कर रखा था तथा चारों और हथियार ही हथियार बिखरे पड़े थे|


इतना दिखाकर तेनालीराम बोले:-” महाराज! यह कोई चमत्कारी बाबा नहीं है| यह वेश बदल कर पड़ोसी शत्रु देश के सैनिक हमारे राज्य में अशांति फैलाने और लूटमार करने के इरादे से यहां आए हैं| जब यह चमत्कारी बाबा बनकर हमारे दरबार में आया था तो मुझे तभी इस पर शक हो गया था| परंतु मेरे पास कोई ठोस सबूत नहीं था| मैं इसका पीछा करते हुए यहां तक आया तो यह बाबा इस सुरंग के अंदर घुसकर गायब हो गया| मैं समझ गया कि इस सुरंग में ही इसका अड्डा है|”


राजा कृष्णदेव राय ने अपने सैनिकों को सभी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया|


महाराज, तेनालीराम से कहने लगे:-” तुम वास्तव में ही काफी चतुर और बुद्धिमान हो| तुम विजयनगर के अनमोल रत्नों में से सबसे बड़े अनमोल रतन हो| आज हम तुम्हारी बुद्धि के हमेशा के लिए कायल हो गए|”


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