राजनैतिक हथियार बन गया है आरक्षण


देश तथा जनता के काम आने वाली नीति 'राजनीति' कहलाती हैै। जब उसका उपयोग व्यक्ति, जाति अथवा दल विशेष के लिए होने लगता है तो वह अनीति बन जाती है। आरक्षण समस्या ऐसी ही जातिगत-दलगत रानीति का दुष्परिणाम है।
संविधान में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित  जनजातियों के लिए लोकसभा व राज्य विधानसभाओं के लिए कुछ स्थान आरक्षित रखने की व्यवस्था की गई थी। साथ ही सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से कुछ पिछड़े नागरिकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। यह व्यवस्था दस वर्षों के लिए की गई थी। संविधान में केन्द्र तथा राज्य की सरकारों का प्रति पांच वर्ष बाद नवीनीकरण (आम चुनाव) का भी प्रावधान रखा गया था। इस पंचवर्षीय सत्ता-नवीनीकरण के आधार पर ही देश के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की थी। देश की स्वतंत्रता में राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। वही एकमात्र सबसे बड़ा राजनैतिक दल था। एक-दो अंतरालों को छोड़कर तभी से देश में इसी दल का शासन रहा है, जोकि वर्तमान में भी है।
कांग्रेस ने आरक्षण व्यवस्था का उपयोग अपने ही दल की सत्ता कायम रखने के लिए करना प्रारंभ किया, उसे अनुसूचित जातियों ें तथा अनुसूचित जनजातियों के एकमुश्त वोट प्राप्त करने के लिए हथियार की तरह काम में लिया। कांग्रेस ने इन जातियों के कुछ प्रभावशाली मुखियाओं को अपने दल में शामिल कर उन्हें सत्ता में भागीदार बनाकर उन्हें अपनी जाति का घोषित क्षत्रप (नेता) बना दिया। आरक्षण व्यवस्था का लाभ इन्हीं क्षत्रपों की संतानों, करीबी रिश्तेदारों तथा उनके कृपा पात्रों को ही दिया जाने लगा। निरन्तर सत्तासीन होते रहने के लिए आरक्षण की समय-सीमा को भी उत्तरोत्तर आगामी दस वर्षों के लिए बढ़ाया जाता रहा है। इसकी सहायता से कांग्रेस लगातार सत्ता-सुख भोगती रही।
पण्डित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद जब उनकी पुत्री इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष मुखर होने लगा। वंशवाद की राजनीति के विरोध में कई प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी तथा अपने गृह राज्यों में क्षेत्रीय दलों का गठन कर कांग्रेस से राज्यों की सत्ता छीननी प्रारंभ कर दी। इन क्षेत्रीय नेताओं ने भी आरक्षण व्यवथा का उपयोग अपने दल की सत्ता स्थापित करने में शुरू कर दिया। अपने-अपने राज्य की बहुसंख्यक जनता को आरक्षण व्यवस्था का लाभ दिया जाने लगा। सत्ता बंदरबांट मंे हर प्रदेश में नये-नये क्षत्रपों का उदय हुआ, जिसे जब भी अवसर मिला उसने अपने समर्थकों को आरक्षण व्यवस्था के दायरे में शामिल कर लिया, जिससे आरक्षण व्यवस्था में भी कई वर्ग तथा उपवर्ग बन गये।
राजस्थान मंे गुर्जर जाति द्वारा अपने वर्ग को अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल करने की मांग को लेकर किया गया आन्दोलन राजस्थान की भाजपा सरकार की ऐसी ही अनीति का परिणाम था। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसंुधरा राजे ने गुर्जर जाति के एकमुश्त वोट पाने के लिए उनके कतिपय नेताओं से गुर्जर जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल करवाने का मौखिक वादा किया था। फलस्वरूप राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गई। सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री ने गुर्जरों के साथ किये गये अपने वादे को भुला दिया। राजस्थान में पहली बार का गुर्जन आंदोलन सरकार की इसी अदूरदर्शिता का परिणाम था। इस आंदोलन ने पैंसठ से भी अधिक लोगों की जान ले ली, जिनमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जिनका आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं था। कई पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी निभाते हुए मारे गए। अरबों रूपयों की सार्वजनिक  संपत्ति आग के हवाले कर दी गई। सर्वाधिक नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ा । रेल, सड़क मार्ग बन्द होने से सारा जनजीवन 20 से 25 दिनों तक थम गया। परीक्षा देने, इंटरव्यू देने, नौकरी ज्वाइन करने वाले सैकड़ों विद्यार्थियों का भविष्य चैपट हो गया। अनेक लोगों को खाने की वस्तुएं तथा पीने के लिए पानी उपलब्ध नहीं हुआ। कइयों की जेबें खाली हो गईं। रास्ते में अटके मरीज चिकित्सा सुविधाओं के अभाव मंे तड़पते रहे। आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई बन्द हो जाने से शहरी परिवारों का बजट भार बढ़ गया।
इन सबका जिम्मेदार कौन है? राज्य सरकार या गुर्जर समुदाय। इस सारे घटनाक्रम में गलती दोनों तरफ से ही हुई है। गुर्जर नेता चार साल तक चुप क्यांें बैठे रहे? यदि सरकार अपने स्तर पर वादा पूरा करने की स्थिति में नहीं थी तो उसे गुर्जर नेतओं को बुलाकर सरकार की कानूनी विवशताएं बतानी चाहिए थीं तथा उसका विकल्प ढंूढना चाहिए था। गुर्जर जाति के विकास के लिए जिस विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा सरकार ने की, उसे बहुत पहले ही विकल्प के रूम में किया जा सकता था। बहुत संभव था गुर्जर समाज उसे मान लेता। आम चुनावों से एक साल पूर्व किये इस आन्दोलन ने निष्क्रिय पड़े अन्य राजनैतिक दलों  को भी एकाएक सक्रिय कर दिया। जिन्होंने बजाय इस समस्या को सुलझाने के उल्टे आग में घी डालना शुरू कर दिया।
इस पूरे विवाद में सर्वाधिक चूक उन गुर्जर नेताओं की रही है, जो मंत्री स्तर की सुविधा भोगते रहे हैं। ये नेता अपने समाज तथा नवयुवकों को यह समझाने में विफल रहे कि विकास की हर राह स्कूल से होकर गुजरती है। केवल आरक्षण वर्ग में शामिल होने मात्र से कोई जाति उन्नति नहीं कर सकती। वर्तमान शिक्षा सेटअप में विकास का प्रवेश द्वार 12 वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद  ही खुलता है तथा आरक्षण का जिन्न तभी मदद के लिए प्रकट होता है। आरक्षण वर्ग में शामिल अन्य जातियों ने इस पर अमल  करके ही उन्नति की है, भले ही उनका वर्ग कैसा भी रहा हो। हजारों सवर्ण नवयुवक इस तथ्य की अनदेखी करने के कारण ही आरक्षित जातियों से पिछड़ें हुए हैं। ”मां सरस्वती की कृपा के बिना लक्ष्मी की प्राप्ति संभव नहीं है।“ यह सभी जातियों को समझना पड़ेगा।
बाद में वसुंधरा सरकार का पतन हो गया। कांग्रेस सत्ता में आई, पर न्यायालय के कारण वह भी गुर्जरों की मांग की पूर्ति नहीं कर पाई। नतीजे में गुर्जर फिर आंदोलन पर उतारू हो गए। उन्होंने रेल और सड़क मार्ग अवरूद्ध कर दिया। तोड़फोड़ तो हुई पर कोई जनहानि नहीं हुई। फिलहाल यह आंदोलन थम गया है। आग पूरी तरह बुझी नहीं है। केवल भभकना शांत हुआ है। जो लावा अन्दर ही अन्दर इकट्ठा हो रहा है, वह कब, किस रूप में फूट पडे़ तथा इसकी चपेट में अन्य राज्य भी आ जायें, इसकी कोई गारंटी नहीं।
आरक्षण देशव्यापी समस्या है। इसका स्थायी समाधान केन्द्र तथा राज्य सरकारों को मिलकर ढूंढना होगा। इसके लिए केन्द्र सरकार को सब दलों, जातियों तथा धर्म आचार्योंं, समाज शास्त्रियों, शि़क्षकों का वृहत सम्मेलन बुलाकर इस समस्या पर गंभीर विचार-विमर्श करना होगा। आरक्षण समस्या शिक्षा एवं रोजगार से जुड़ी है। इसका हल भी शिक्षा जगत से ही ढंूढना होगा। इसके लिए केन्द्रीय सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय को देश के सारे विश्वविद्यालय तथा उनसे जुड़े कालेजों (महाविद्यालयों) तथा अन्य सभी निजी काॅलेजों के विद्याािर्थयों से एक विस्तृत प्रश्नावली के रूप में उनकी राय मांगनी चाहिए।
उपर्युक्त सभी तरीकों से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर इस समस्या का सदा के लिए समाधान संभव है, तभी देश को ऐसे आन्दोलनों से मुक्ति मिल पायेगी।


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