नारी होने पर लज्जा
कहानी
बंदरिया ने मृत बच्चे को अपनी छाती से लगा रखा था। जब वह हमारी छत से दूसरी छत पर कूदी तो भी उसने इसे एक हाथ से बड़ी सावधानीपूर्वक संभाले रखा। मैनें इसे देख आवाज लगाई- उषा, जरा जल्दी बाहर आओ। देखो। यह है मां की सच्ची ममता।
उषा ने आते ही कहा- 'ओह बलजीत!' मैंने सोचा कुछ नया बताने लगे हैं। मैं पिछले तीन दिनों से इस अद्भुत दृश्य को देख रही हंू।... मेरे देखते-देखते ही वह बच्चा बिजली के करंट से सामने वाली गली में गिरा था। बांदरी रोती-चीखती गली में कूद पड़ी। अपने बच्चे को बार-बार हिलाती-डुलाती रही किन्तु वह मर चुका था।
'तब?' बलजीत ने चकित होकर पूछा।
'तब से अब तक यह मां अपने बच्चे को छाती से लगाए हुए है। कभी-कभी उतारकर रखती तो है किन्तु लाश के पास बड़ी सावधान होकर बैठी, इसे देखती रहती है। और कहते-कहते उषा चुप हो गई।'
'हां, हां, कहो। चुप क्यों हो गई।'
'इसी गली के उस तंग छोर में कल प्रातः एक नवजात शिशु के लावारिस पड़े होने की खबर मुझे कौशल्या दीदी ने बताई। इंसान का बच्चा गली में लावारिस... कोई भी कुत्ता, बिल्ली उसे खा सकते थे, जबकि पशुु का बच्चा मां की छाती के साथ वात्सल्य पा रहा है... मुझे अपने नारी होने पर इतनी लज्जा तथा ग्लानि हुई कि मैं ये दोनों बातें आपको बताने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाई थी।... अब आपने ही इसे देख लिया तो...।' कहते-कहते उषा रसोई घर मेें घुस गई।
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