जीवन में समझौते का महत्व

हमारे जीवन में समझौतों का बहुत महत्व है, बल्कि हम कह सकते हैं कि हमारा समूचा जीवन ही समझौतों का एक कभी न टूटने वाला सिलसिला हैै। कोई शख्स कितना भी शक्शिाली, घमंडी और अमीर क्यों न हो उसे भी जीवित रहने के लिए कई बार कई जगह समझौते करने ही पड़ते है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि उसे भी दूसरों के विचारों को महत्व देना पड़ता है, उनका आदर करना पड़ता है। हम दूर न जाकर अपने परिवार को ही लें। आजकल के छोटे परिवारों में मां-बाप, बच्चे और कभी-कभी सास ससुर साथ रहते है। 
बुजुर्गों के साथ तो कई बातों में मतभेद होने पर समझौते करने ही पड़ते हैं कुछ वे झुकते हैं कुछ बेटे-बहू तभी घर मे सुख- शांति रह सकती है। नहीं तो आए दिन छोटी-छोटी बातों को लेकर मतभेद और उससे उत्पन्न तकरारों का सामना करना पड़ता है, जिससे घर की शांति तो भंग होती ही है पास-पड़ोस में बदनामी भी होती है और लोगों का मुक्त में मनोरंजन होता रहता है। यही हाल बच्चों के साथ है, बढ़ते हुए बच्चे अपनी अस्मिता के प्रति जागरूक रहते हैं। अपने अहं की संतुष्टि के लिए वे कई बार आपके ठीक विपरीत जाएंगे। खासकर किशोरावस्था में जब बच्चे न उच्चे ही रह जाते है न बड़ों में ही उनकी गिनती आती हैं, तब वे अघिक संवेदशील और विद्रोही हो जाते हैं। उनके साथ व्यवहार में तब आपको काफी सूझबूझ और धैर्य से काम लेना होता है। ऐसे समय में भी समझौतों की आवश्यकता पड़ती है। समझौते का मतलब यह हर्गिज नहीं कि आप उनकी वाजिब और गैरवाजिब हर बात पर झुकते हैं और उन्हें मनमानी करने दें, ऐसा न करके कोई बीच का रास्ता अपनाया जा सकता है, जिससे बच्चों को यह भी न लगे कि बनकी बात नहीं मानी जा रही है, उनका विरोध किया जा रहा है, और आपकी बात भी रह जाए,  जो कि अक्सर उन्हीं की भलाई के लिए होती है। जिसे वे अपनी अपरिपक्वता तथा नादानी के कारण उस समय समझ नहीं पाते हैं। 
उदाहरण के लिए आपकी बेटी अपने मित्र के साथ पिक्चर जाने की जिद कर रही है तो आप उसे छूटते ही कड़े शब्दों में इंकार न करें, हो सके तो बसके हम उम्र भाई या बहत अगर हैं तो उसे भी साथ भेज दें या किसी और सहेली को साथ ले जाने को कहें या फिर यह कह सकती हैं कि 'बेटी क्यों न यह पिक्टर तुम हमारे साथ ही देखो। आखिर आप भी तो पिक्चर बेटी की पसंद की ही देख लें तो उसमें हर्ज ही क्या है, उसका मन भी रह जाएगा, वह आपसे नाराज होकर मुंह न फुलाएगी, या हो सकता है वह विद्रोह मर ही उतर आये। हर बात के लिए अगर आप बच्चों को टोकते रहने या न करते रहने की आदत डाल लेंगे तो वे भी आपकी मर्जी के खिलाफ जाने की आदत डाल लेंगे। आपके घर में नई बहू आती है। अलग वातावरण में पत्नी होने के कारण उसकी आदतें आपके घर के अनुरूप एकदम तो नहीं हो सकतीं। आप धैर्य और समझ से काम लेंगे, उसे थोड़ा वक्त देंगे, तभी वह अपने आपको घर के रंग मे ढाल पाएगी । 
घर मे हंसी-खुशी का हल्का-फुलका माहैाल बनाए रखने के लिए स्वभाव का लचीलापन निहायत जरूरी है। कठोर अनुशासन में हर घड़ी रहना कोई पसंद नहीं करता चाहे फिर वो आपके बेटे-बेटी हों, बहू हो या पोते-पोती। जी, हां छोटे बच्चे भी विद्रोह करना बखूबी जानते हैं। नन्हें-नन्हें हाथ-पैर पटककर चीख-चिल्लाकर वे भी अपनी नाराजगी प्रकट करना जानते हैं। समझौते की आदत अगर बड़ों में होगी तो बच्चे स्वतः ही इसे अपना लेंगे। सभी मां-बाप अपने बच्चों को स्नेह करते हैं, उसी तरह बच्चे भी मां-बाप को प्यार करते हैं। समझौता उसी प्यार और स्नेह का प्रदर्शन है। स्नेह, प्यार करने वालों के लिए समझौतों से आपसी यद्भाव बढ़ता है। एक -दूसरे को समझना आसान हो जाता है। समझौतों से जीवनपथ सुगम हो जाता है, जिस पर वक्त के पहिए आसानी  से फिसलतें चले जाते हैं। आपसी रिश्ते आईने की तरह नाजुक होते है जो चटख गए तो फिर कभी नहीं जुड़ पाते। दैनिक जीवन मे हम छोटी-छोटी तुच्छ बातों में दूसरों की भवना की परवाह किए बगैर अपनी ही मर्जी चलाना चाहते हैं, हमारा अहं, इतना प्रबल होता है कि दूसरे की मर्जी को मान लेना हम अपनी हार समझते हैं। 
इस तरह अहंवादी बनकर हम हर जब हर एक के पास सोचने के लिए अपना दिमाग, अपनी बुद्धि है, तो फिर उसे अपने ढंग से सोचने और व्यवहार करने की आजादी क्यों न मिले? जैसे आपको अपने ऊपर किसी की पर्जी लादा जाना अच्छा नहीं लगता तो दूसरे को भी यह अच्छा नहीं लगेगा, फिर इसका हल क्या है? इसका हल है समझौता। एक बहुत छोटा सा उदाहरण है, आपको अरहर की दाल पसंद है और आपके पति को उड़द की दाल। आप रोज ही अरहर की दाल बनाएंगी तो लाजिमी है कि पतिदेव के बुरा लगेगा, वे खुद यह कभी न कहेंगे कि तुम अरहर की दाल कभी न बनाओ और चूंकि मुझे उड़द की दाल मसंद है रोज़ उड़द की दाल ही बनाओ। इसलिए आप कभी बनकी पसंद की उड़द की दाल बनाएगी और कभी अपनी पसंद की अरहर की तो पतिदेव भी खुश रहेंगे और आप भी खुश। छोटी-छोटी रोजमर्रा की बातों से ही पति, घर परिवार तथा जीवन में मधुरता या कड़वाहट पैदा होती है। जिनका कारण समझौते करना या न करना ही होता है। 
पति-पत्नी जब एक-दूसरे का दृष्टिकोण समझने से इंकार कर एक-दूसरे के सामने चुनौती बन खड़ हो जाते हैं, अपने-अपने अहं के विष्धरों को दूध पिलाते, वातावरण विषमय कर लेते हैं, जिसकी फिजा में फिर उन्हें सांस लेना दूभर हो जाता है। नतीजा होता है अलगाव, तलाक परिवार का तितर-बितर हो जाना। प्यार का नीड़ जो उन्होंने कभी यत्न से बनाया था, तितर-बितर हो जाता है। ऐसे में बच्चों को ज्यादा फजीहद होती है क्योंकि उन्हें माता-पिता दोनों के होते हुए भी एक के प्यार से वंचित रह जाना पड़ता है जो उनके व्यक्तित्व के संमूर्ण विकास में बाधक होता है। जीवन में संघर्ष की हर क्षेत्र में संभावना बनी ही रहती है, जिसके मूल में कारण यही है कि कोई भी दो व्यक्ति एक से नही मिलेंगे। उनकी सोच, शिक्षा-दीक्षा कंपनी, मित्र मंडली जिनमें उठते-बैठते हैं उनके वंशानुगत गुण-अवगुण भिन्न-भिन्न होते हैं। अतः साथ रहने के लिए काफी समझौते करने पड़ते हैं। घर की तरह ही बाहर नौकरी, वयापार इत्यादि में भी समझौता किए बगैर काम नहीं चलता। मिस्टर खन्ना पहले दर्जे के अहंवादी हैं अपने आगे वे किसी को कुछ नहीं समझते, उनकी मानसिकता है 'अहं ब्रह्यस्मि'। विधवा बूढ़ी मां और अनमढ़ बीबी पर तो अपना हुकुम चला लेते हैं लेकिन यही तेवर जब वे अपने सहकर्मियों में दिखाते हैं, तो वे भला उनका रौब क्यों सहने लगे। इस कारण वे सबसे आये दिन उलझते रहते हैं। परिणामस्वरूप बनके बाॅस से उनकी शिकायतें होने लगीं। शुरू में बनके बाॅस मिस्टर सेठी ने ध्यान नहीं दिया वे अभी नए-नए ट्रान्सफर होकर आए थेै लेकिन जब वे खुद खन्ना के संपर्क में आने लगे और यही तेवर उसने बाॅस का बाॅस बनकर दिखाने चहो, तो पहले उन्होंने चेतावनी देकर छोड़ दिया, लेकिन इस पर भी जब खन्ना का रवैया न बदला दूर-दराज के छोटे से गांव में कर दिया गया। अब खन्ना के होश ठिकाने आए, जाकर बाॅस से माफी मांगी, बीबी-बच्चों की दुहाई दी अब वह अपरी सही स्थिति पर आ गया था, तब बाॅस ने आखिरी चेतावनी देकर माफ कर दिया।  


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