घरेलू हिंसा से अब भी मुक्ति नहीं महिलाओं को
बाहर जाकर कुछ हजार रुपए कमाने वाली महिलाएं, गृहणियों से ऊपर क्यों मानी जाती हैं? ऐसा नहीं हैं कि ये महिलाएं बाहर नौकरी करके आत्मनिर्भर हैं और गष्हणियां घर में रहकर बेकार हैं। क्या मां की ममता, पत्नी का कर्तव्य, बहू के रूप में महिला का त्याग इन सब के कोई मायने नहीं? अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं को समर्पित एक दिन है। यह हर महिला के लिए गौरव का दिन है। आज भी कई घर ऐसे हैं जहां महिलाएं दिन रात काम करती हैं फिर भी घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। सड़क पर चलते हुए छेड़छाड़ और बलात्कार की भी शिकार हो जाती हैं। यही नहीं घर में भी यौन उत्पीड़न का निशाना बनती हैं।
सीमा की जब शादी तय हुई, तो किसी ने उसे नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया पर शादी के बाद परिवार और उसके पति को उसका नौकरी करना अच्छा नहीं लगा। उस वक्त कोई भी रास्ता सीमा की समझ में नहीं आया आखिरकार उसे अपनी शादी तोड़नी पड़ी।
रश्मि और अमित एक साथ नौकरी करते थे। शादी के बाद रष्मि ने अपना पासबुक, चेक और दूसरे कागजात अपने ससुराल वालों के हवाले कर दिया। नतीजा यह कि उसके पति के साथ-साथ ससुराल वालों ने भी उस पर हक जता लिया। रश्मि को अपने टूटे सैंडल बदलने के लिए भी ससुराल वालों की आज्ञा लेनी पड़ती थी। इससे रश्मि को मानसिक आघात लगा और उसे मायके जाना पड़ा।
यह सब घरेलू हिंसा के कुछ उदाहरण हैं। ऐसा नहीं कि महिलाओं को सिर्फ अपने पतियों से ही परेशानी है। अकेली औरत को भी उसके माता-पिता नहीं पूछते। कारण मात्र एक ही होता है कि वह असहाय नारी है। यह सब इसलिए होता हैं क्योंकि महिलाएं सजग नहीं होतीं। लेकिन अब तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है।
दरअसल, भारत के महानगरों और कस्बों में पढ़ी-लिखी महिलाएं भी घरेलू हिंसा से निपटने के लिए बने कानून 'डीवीए' (डोमेस्टिक वायलंस एक्ट) के बारे में नहीं जानतीं। अक्टूबर, 2006 में बने अधिनियम की जानकारी अब कई शहरी महिलाओं को ही नहीं, तो छोटे शहरों-कस्बों और गांव की कम पढ़ी और निरक्षर महिलाओं को क्या होगी? हालांकि महिलाओं की सुरक्षा के लिए जब यह कानून बना था तब उम्मीद जगी थी कि घरेलू हिंसा से महिलाओं को मुक्ति मिलेगी। क्योंकि यह अधिनियम उन महिलाओं के लिए खास-तौर से बना था जो पति या ससुराल वालों से मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित होती हैं।
पहले जहां पुरुषों से प्रताड़ित महिलाएं भारतीय दंड सहिता की धारा 498 'ए' पर केस कर अपने लिए तलाक और इंसाफ मांगती थी। वहीं आज डीवीए एक्ट के आने के बाद महिलाएं किसी भी तरह की घरेलू हिंसा के खिलाफ केस कर सकती हैं। न सिर्फ शादी-शुदा बल्कि कोई भी महिला। घरेलू हिंसा को पारिभाषित करता यह एक ऐसा कानून है जिसमें किसी भी तरह की प्रताड़ना जैसे धमकी देना, गाली देना, शारीरिक व मानसिक चोट पहुंचना, आर्थिक सहायता न देना या जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाना तक सभी शामिल हैं। सरकार ने अधिकारी भी तैनात किए हैं जो इस हिंसा की छानबीन करते हैं। वे घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं और बच्चों की मदद करते हैं।
घरेलू हिंसा जैसे अपराध चाहे वह पति करे या कोई और, महिलाओं को जबरदस्त मानसिक आघात देता है जिससे वह जीवन भर एक डर या खौफ में जीती हैं। ऐसे हालात से उबर पाना काफी मुश्किल होता है। कई मामलों में तो महिलाओं का नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता है या उन्हें हार्ट-अटैक भी हो जाता है। आम महिला पूरी तरह अपने पति पर निर्भर होती है जबकि कई मामलों में पति उसे अपनी जायदाद समझने लगता है। वह उसके लिए मनोरंजन का साधन होती है और चुपचाप हिंसा को सहती जाती है।
इस देश में हर व्यक्ति को चाहे वह महिला हो या पुरुष, उसे पूरी गरिमा और स्वाभिमान से जीने का अधिकार है। दुर्भाग्यवश लंबे समय से महिलाओं को पुरुषों जैसे अधिकार नहीं मिले। कई एनजीओ महिलाओं को उनका अपना हक दिलाने की कोशिश में लगे हैं। वे महिलाओं की अंदर की शक्ति को उजागर करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि वे अपने अधिकार जान पाएं। हर तीन में से एक महिला बंद दरवाजे के पीछे घरेलू हिंसा का शिकार होती है। अपने अंदर की नारी शक्ति को पहचानिए और इस महिला दिवस पर घरेलू हिंसा के खिलाफ बोलने की ठान लीजिए।
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