भ्रश्टाचार आज की सबसे बड़ी समस्या
भारत की संस्कृति अध्यात्म प्रधान संस्कृति है। भोगने और देखने की जीवनशैली ही ऋषियों-मुनियों की सम्पूर्ण जिन्दगी का व्याख्या सूत्र है। यही व्याख्या सूत्र जन-जन की जीवनशेैली बने, तभी व्यक्ति समस्याओं से मुक्ति पाकर सुखी और शांतिपूर्ण जीवन का आनन्द पा सकता हैै।
विलासिता व्यक्ति की न तो आवश्यकता है, न अनिवार्यता, न सुविधा हेै और न ही मनोरंजन। वह केवल भोगवृद्धि का उच्छंृखल रूप हैै। समझदार मनुष्य उसमें किसी भी सार्थक तल को नहीं देख पाता। वहां केवल अर्थ की लोलुपता और उसकी पूर्ति के साधन के सिवाय और कुछ नहीं बचता। विलासिता केवल भोग का पोषण है। इसमें काम और अहम दोनों वृत्तियां काम करती हैं।
आज का मनुष्य भ्रम में जी रहा है। जो सुख शाश्वत नहीं है, उसके पीछे मृग मरीचिका की तरह भाग रहा है। धन-दौलत, जर-जमीन कब किसके रहे हैं इस संसार में शाश्वत? परन्तु मनुष्य मान बैठा है कि सब कुछ उसके साथ ही जाने वाला है। पूरी दुनिया पर विजय की आकांक्षा पालने वाला सिकन्दर भी मौत के बाद अपने साथ कुछ लेकर नहीं गया, खाली हाथ ही गया था।
आकांक्षाएं-कामनाएं वह दीमक हैं, जो सुखी और शांतिवूर्ण जीवन को खोखला कर देती है। कामना-वासना के भंवरजाल में फंस मन, लहलहाती इन्द्रिय विषयों की फसल पर झपट पड़ता है। आकर्षक-लुभावने विज्ञापनांे के प्रलोभनों में फंसा तथा उच्च जीवन स्तर के नाम की आड़ में व्यक्ति ढेर सारी आवश्यक वस्तुओं को चाहने लगता है, जिनका न कहीं ओर है न छोर।
मनुष्य हम दो में सिमटता, सिकुड़ता जा रहा है। फलतः मानवीय संबंध बुरी तरह से प्रभावित होकर बिखर रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं, स्नेहिल संबंधों में दरारें पड़ रही हैं। ये सब बातें भारतीय संस्कृति के मूलभूत सिद्धान्त, सदाचार, सद्भाव, शांति, समता, समरसता को खत्म करने पर तुले हुए हैं। मनुष्य स्वभावतः कामना बहुल होता है। एक लालसा-कामना अनेक लालसाओं की जननी बनती है। मनुष्य हम दो में सिमटता, सिकुड़ता जा रहा है। फलतः मानवीय संबंध बुरी तरह से प्रभावित होकर बिखर रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं, स्नेहिल संबंधों में दरारें पड़ रही हैं। ये सब बातें भारतीय संस्कृति के मूलभूत सिद्धान्त, सदाचार, सद्भाव, शांति, समता, समरसता को खत्म करने पर तुले हुए हैं। मनुष्य स्वभावतः कामना बहुल होता है। एक लालसा-कामना अनेक लालसाओं की जननी बनती है।
समस्याएं जीवन का अभिन्न अंग है, जिनका अंत कभी नहीं हो सकता है। एक समस्या जाती है तो दूसरी आ जाती है। यह जीवन की प्राकृतिक चक्रीय प्ऱिक्रया है। वर्तमान युग में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसे किसी प्रकार की समस्या न हो। व्यक्ति घर का स्वामी है,समाज एवं संस्था का संचालक है या किसी जनसमूह का प्रबंधक एवं व्यवस्थापक है तो उसके सामने समस्याएं आना अनिवार्य है। व्यक्ति चाहे अकेला हो या पारिवारिक, समस्याएं सभी के साथ आती हैं। सारी समस्याओं का समाधान है। अटल धैर्य के बल पर व्यक्ति को समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। व्यक्ति को इस तथ्य एवं सच्चाई को मानना होगा कि जीवन में सदैव उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। जीवन में ऐसी घटनाएं घट जाती हैं, जिनकी वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकते, लेकिन उसको किसी अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना धैर्य एवं संतुलन नहीं खोना चाहिए।
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